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खारून गंगा आरती: (वैशाख पूर्णिमा, 2082 विक्रम संवत)

जय हिंद साथियों,

मैं, वीरेंद्र सिंह तोमर, आज आपसे माँ खारून के पावन तट पर हाल ही में संपन्न हुई भव्य गंगा आरती के बारे में बात करना चाहता हूँ। वैशाख पूर्णिमा के इस शुभ अवसर पर, रायपुर के महादेव घाट पर आस्था और संस्कृति का एक अद्भुत संगम देखने को मिला।

माँ खारून, हमारी जीवनदायिनी, छत्तीसगढ़ की पवित्र नदियों में से एक हैं। हर पूर्णिमा को उनके तट पर होने वाली गंगा आरती एक ऐसी परंपरा बन गई है जो न केवल हमारी धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करती है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक एकता और नदी के प्रति सम्मान को भी दर्शाती है।


वैशाख पूर्णिमा का दिव्य आयोजन

इस बार वैशाख पूर्णिमा पर महादेव घाट पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। संध्या के मनोरम वातावरण में हजारों दीपों की जगमगाहट और माँ खारून की लहरों पर उनका प्रतिबिंब एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। सामूहिक आरती के दौरान गूंजते भक्तिमय स्वरों ने पूरे वातावरण को श्रद्धा और भक्ति से सराबोर कर दिया था।


युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी

यह देखकर अत्यंत सुखद अनुभव हुआ कि इस बार की आरती में युवाओं ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया। हमारी नई पीढ़ी का अपनी संस्कृति और परंपराओं से इस प्रकार जुड़ना भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि हमारी आस्था और मूल्य पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहे हैं।


स्वच्छता और पर्यावरण का संदेश

खारून गंगा आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमें अपनी नदियों और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी का भी स्मरण कराती है। आरती के समापन पर सभी श्रद्धालुओं ने माँ खारून को स्वच्छ रखने और पर्यावरण की रक्षा करने का संकल्प लिया। यह संदेश आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हमारी नदियाँ प्रदूषण के खतरे का सामना कर रही हैं।

यह भव्य आयोजन माँ खारून के प्रति हमारी अटूट श्रद्धा और हमारी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है। यह हमें एकजुट होकर अपने जल स्रोतों का सम्मान करने और अपनी परंपराओं को संजोए रखने की प्रेरणा देता है।

आइए, हम सब मिलकर माँ खारून का आशीर्वाद लें और यह प्रतिज्ञा करें कि हम हमेशा अपनी नदियों और अपनी संस्कृति की रक्षा करेंगे।

जय माँ खारून!